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मंगलवार, 27 नवंबर 2018

मुखौटे

कितना चिकना हो गया हूँमैं
कमब्खत,आइना हो गया हूँ मैं
हर शख्स है खुश
मुझमें अपने जैसा देखकर,

मै भी हूँ खुश
मुखौटों कि आड़ से
अपने जैसा चेहरा देखकर

मुखौटे
मुस्कुराने वाले,
मुखौटे
रोने वाले,
फेसबुक पर
बहुत खुश होंने वाले,

अमीरी वाले,
गरीबी वाले,
और गरीबों के खातिर,
ढे़र सारे रौबीले मुखौटे,

बड़ी-बड़ी पार्टियो के खातिर
सख्त अभिमानी मुखौटे,
लम्बी नाक वाले
सिद्धान्तवादी मुखौटे,
राजनीतिक सभाओ के खातिर
जातिवादी मुखौटे,

चुपके से पहनता हूं
बातचीत के बीच
अवसरवादी मुखौटे,

भिंच गये हैं मेरे जबडे
मुखौटे के खाचों से
जुबान हिलती है
मगर
बोलती नही।
आँखे छलकती है
मगर
सोख लेते है आँसू
मुखौटे।

सोमवार, 26 नवंबर 2018

कैन्टीन का कप

चट्टाख्ख
बिखरा है
कोने में
मेज के नीचे
एक कप
आँखिरी साँस
गिनता हुआ

गर्म भट्ठ़ो से निकलकर
खुबसुरत डिब्बों कि सवारी पर
जब आया था
पहली बार कैन्टीन मे
किसी खुबसूरत दुल्हे कि तरह
चमकदार

कई खुबसूरत हसीन हाथों को
चुमा था इसने और
चुमा था इसको
कई हसीन होठों ने

इसने देखें कई
प्रणय
और विरह
कभी
गहरी खामोशी
दो जोडी आँखों कि

याद है इसे वो दिन
जब प्रेमिका ने खुश होकर
लगाया था इसे सीने से
और दर्द मे
इसने ही सम्भाला था
उसके आँसुओं कि बूदों को
बुदों मे भीगा
इसका रोम-रोम
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रोम-रोम मे
धुआं ही धुआं
और बगल मे गर्म फेफड़े सी
ऐश-ट्रे और
ऐश-ट्रे मे
ख्वाहिशो
उम्मीदों
के अधजले टुकड़े
और सामने जिम्मेदारीयो से बोझिल
युवा मन

परत दर परत
खो रहा था अपनी चमक
ये कप
वक्त ने दिये इसे
कई निशान
टुटन
चिरकन
कप ने तय किया लम्बा सफर
आगे के टेबल से
पीछे के टेबल तक

और चला आया
उन काँपते हाथों मे
जिन्होंने अब तक सम्भाला था
टुटे फ्रेम का चश्मा
इसने चोर निगाहों से देखा था
पल्लू मे बंधा दस का नोट और
एक खुराक खांसी की

जानी थी इसने
मजबूरी भूख कि
और प्यास
लार मे चटचटाती
जीभ कि

काँपते हाथ
कब तक देते साथ
खत्म हो चुकी थी
कप कि भी बात

कोई बहाना न देख
गलती से छडी कप से टकराईं
सांसो ने छोडा साथ
और आवाज आयी
चट्टाख्ख

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