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रविवार, 2 दिसंबर 2018

रँग


खेलता था बचपन में,
भर देता था दीवार,
मोम के रंगों से।

शौक से लुटता था,
रंग-बिरंगी पतगें,
लाल,हरी-
चटख पीली।

घर के पूजा मे,
दौड़ता था दिन भर,
पैरों मे रचा महावर।

होली के रंगों मे आज भी,
भीगा है मेरा पहला प्रेम।

आज मैं चित्रकार हूं,
पसन्द है मुझे
रंगों में उगंलियाँ डूबोना
सुंघना हर रंग को,
महसूसना उसके ताजेपन को।

और पसंद है मुझे
रात भर लिपटकर सोना
रंगों के साथ।

देखना
सूखते रंगों का रंग बदलना।
करना
नये रंगों का सृजन।

पर, अब डरता हूं
सकरा होके संम्भलता हूं
कुचल ना जाये कहीं मेरे रंग
किसी बुद्धिजीवी के तर्क से।

रंग तो बिना अर्थ के भी देते है खुशी
फिर क्यूँ हर रंग मे ढूंढता है कोई अर्थ।

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