- खाली वक्त जो आज शायद ही किसी के पास हो।पन्ने भरे पडे है शेड्यूलो से। दिमाग मे काम कि लिस्ट बनती बिगड़ती रहती है।समय को पैसे कि तरह खर्च करना सिखते है हम।बचपन से हमें समझाया जाता है कि टाइम इज मनी।और मै दिन भर समय के हिसाब को ठीक करने मे लगा रहता हुं पर मेरे बागीचे मे धूप मे सोया कुत्ता ये बात नहीं समझता।आराम से अंगडाइया लेता है बहुत ज्यादा शोर पर भी थोड़ा सा आंख खोल बिना कोई मौखिक प्रतिक्रिया दिये फिर टांग पसार लेता है उसकी सुखभरी गहरी नींद को देख समझ नही आता उससे जलू या उसे किसी तरह समझा दू कि टाइम ईज मनी। पर ये भी हो सकता है कि वो अपना क्वालिटी टाइम गुजार रहा हो। जैसे रात मे सोते समय हम हिसाब लगाते है कि दिनभर अपनी खुशी के लिए या ऐसी चीजें, जो आगे चलकर हमें खुशी दे सकती हैं। के लिए कितना समय दिया और कितना व्यर्थ कर दिया या न चाहते हुये दुसरे पर खर्च करना पड़ा। इन्सान टाइम मैनेज भी कर लेता हैं।शायद ही किसी अन्य जीव को अपने समय के महत्व कि इतनी समझ हो। हमने तो किस समय कितना हंसना हैं और कब सिर्फ मुस्कुराना है तक ईजाद कर लिया है। पर अभी भी कुछ खाली वक्त हमारी झोली मे ऐसे गिरते है जैसे सड़क पर गिरा एक का सिक्का जो कि हमारे तेज कदमों और और दौडते विचारों को यकायक रोक हमें पैसा पाने कि वहीं खुशी देता हैं जो बचपन से आज तक नही बदली। रात किसी मेजबान के घर सोने पर जगह बदलने के कारण जब नींद नही आती।और आप न मोबाइल चला सकते हैं न लाईट जला सकते है।इस वक्त आप मजबूर होते है कुछ न करने के लिए।और होता है आपके पास ढे़र सारा खाली वक्त। दवाखाने मे डाक्टर से मिलने के इंतजार मे बैठे खुद के दर्द से परेशान जब दुसरे मरीजों के चेहरे पढते है।तब होता है हमारे पास ढ़ेर सारा खाली वक्त। छूट जाये जब आखिरी बस या ट्रेन कभी तब भी वक्त हमारे सामने खडा होता है हमसे गले मिलकर आगे बढ़ने को।दिनभर मे कई बार हमें इस तरह के खाली वक्त कैशबैक कूपन्स कि तरह मिलते रहते है।और यही छोटे-2 समय के कतरे हमसे हमारी पहचान कराते है। ये पल हमारे दौड़ते कदमों को रोकते है और करते है हमें मजबूर ये समझने के लिए कि हम इन्सान है मशीन नही जिस जमीन पर हम दौड़ रहे है हम खुद उसका ही हिस्सा है।
www.soulofblackman.blogspot.com,स्वरचित मौलिक, सृजनात्मक, समसामयिक व ज्वलन्त मुद्दों पर कविताऐ जो मानव मन और समाज को अलग दृष्टिकोण से देखती है।
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मंगलवार, 11 दिसंबर 2018
खाली वक्त
गुरुवार, 6 दिसंबर 2018
मेरा कमरा
गायब हुये सामानों
कि सुची-
एकांत,
अवसाद,
दिन के उजाले मे
रात सा अन्धकार,
आधी फुकी सिगरेटों से भरा
एश-र्टे,
दिवारों पर लिखी
अधुरी कविताएं,
और
और.....
ऐसा बहुत कुछ
जो रगींन कल्पनाओ मे
घुला चारदिवारों से
टकराता
हिलोरे लेता
तैरता रहता था।
बुधवार, 5 दिसंबर 2018
निष्पक्ष
कुछ निष्पक्ष
बेहद पाक
बच्चे कि मुस्कान जैसा
खेत मे लहलहाते धान जैसा
शान्त शमशान जैसा
माँ के आँचल छाँव जैसा
बेहद निष्पक्ष
पर
जब उठती है कलम
लिखती है स्याही मे
घोल के
विचारों मे
मेरा पक्ष
शब्द के तीर
चलते है
मेरे भावनाओं के
कमान से
शायद
हम जिन चीजों को
बाँध नहीं सकते शब्दों मे
उनका पक्ष
हमे निष्पक्ष
लिख दे।
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रविवार, 2 दिसंबर 2018
रँग
खेलता था बचपन में,
भर देता था दीवार,
मोम के रंगों से।
शौक से लुटता था,
रंग-बिरंगी पतगें,
लाल,हरी-
चटख पीली।
घर के पूजा मे,
दौड़ता था दिन भर,
पैरों मे रचा महावर।
होली के रंगों मे आज भी,
भीगा है मेरा पहला प्रेम।
आज मैं चित्रकार हूं,
पसन्द है मुझे
रंगों में उगंलियाँ डूबोना
सुंघना हर रंग को,
महसूसना उसके ताजेपन को।
और पसंद है मुझे
रात भर लिपटकर सोना
रंगों के साथ।
देखना
सूखते रंगों का रंग बदलना।
करना
नये रंगों का सृजन।
पर, अब डरता हूं
सकरा होके संम्भलता हूं
कुचल ना जाये कहीं मेरे रंग
किसी बुद्धिजीवी के तर्क से।
रंग तो बिना अर्थ के भी देते है खुशी
फिर क्यूँ हर रंग मे ढूंढता है कोई अर्थ।
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कहानियां
अक्सर मेरे करीब से कहानियां गुजरतीं हैं छुती हैं मुझको और झिझोड़ती है। जिस्म बेचती औरते मेरे जेहन मे अजीब लाईनें उकेरती है अक्सर मेरे ...